Wednesday, August 9, 2017

कन्नौज : राजकीय पुरातत्व संग्रहालय

कन्नौज : राजकीय पुरातत्व संग्रहालय

इत्र और इतिहास की नगरी कान्यकुब्ज वर्तमान जिला कन्नौज ईसा की द्दठी शती के उत्तरार्द्घ से लेकर बारहवीं शती ई० के अन्त तक उत्तर भारत का महत्वपूर्ण अग्रणी नगरों मे से एक था। कन्नौज लगभग 600 वर्ष तक उत्तर भारत का केन्द्र बिन्दु था, जहां मौखरी वंश, वर्द्घन वंश, प्रतिहार वंश, गहड़वाल वंश पुष्पित पल्लवित हुयें नवीं शती ई० में कन्नौज दक्षिण के राष्ट्रकूट, पूर्व के पाल और उत्तर पश्चिम के प्रतिहार शक्तियों के मध्य त्रिकोणात्मक शक्ति संतुलन का केन्द्र बन गया था। जिस प्रकार मौर्य युग से लेकर गुप्त काल तक पाटलिपुत्र (पटना) का शासक भारत का सार्वभौम चक्रवर्ती सम्राट माना जाता था, उसी प्रकार हर्षोत्तर काल में कान्यकुब्जाधिपति को शक्ति का प्रतीक माना जाता था। कन्नौज संग्रहालय समिति ने 25 फरवरी 1975 को कन्नौज में संग्रहालय की स्थापना की। कन्नौज संग्रहालय में प्रागैतिहासिक अस्थि उपकरण महाभारत कालीन स्लेटी भूरे चित्रित पात्र, उत्तरी कृष्ण मार्जित मृदभांड, मृर्तिका, पाटल, मुद्रा, सील, सिक्के, मृण्मूर्ति, हाथी दांत की कलाकृतियों, मनकें, पाषाण प्रतिमाएं संग्रहीत है, जिसमें विशेष रावणानुग्रह, भैरवरूप में विषपान तपस्विनी पार्वती, कार्तिकेय, नृत्य गणेश, विष्णु, विश्वरूप विष्णु, हरिहर, सूर्य प्रतिमाएं, ब्रहमा, अग्नि, देवी प्रतिमाएं महिषासुरमर्दिनी दुर्गा, शांत रूप दुर्गा, चामुण्डा, सप्तमातृका, नौगृह, तीर्थकर प्रतिमाएं संग्रहीत है। यह संग्रहालय प्रतिहार काल की कलाकृतियों के लिये विश्वविख्यात है। 29 फरवरी 1996 को पुरातत्व संग्रहालय को शासकीय संग्रहालय घोषित करते हुये राजकीय पुरातत्व संग्रहालय का स्वरूप प्रदान किया गया।

इसमें प्रवेश निशुल्क है तथा साप्ताहिक अवकाश सोमवार का रहता है इसके अलावा द्वितीय शनिवार के पश्चात आने वाला रविवार तथा अन्य राजपत्रित अवकाश रहते है। इसके भ्रमण का समय सुबह 10:30 से शाम 04:30 तक है।
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मोहम्मद आकिब खांन (सोशल एक्टिविस्ट)
कुबेरपुर, कायमगंज, फर्रुखाबाद (उ०प्र०)

नोट:- पोस्ट कॉपी करने से पूर्व इस मो० +91- 9044441004 तथा ईमेल aqibfarrukhabadi@gmail.com पर संपर्क कर अनुमति लें और कॉपी करने पर इस पेज का नाम अवश्य लिखें।

Saturday, August 5, 2017

फर्रुखाबादी खानपान व व्यंजन : कपूरकंद

फर्रुखाबादी खानपान व व्यंजन : कपूरकंद

फर्रुखाबाद में निर्मित मिठाई : कपूरकंद
कपूरकंद एक विशेष मिठाई है जो एकमात्र फर्रुखाबाद (उ०प्र०) में ही बनती है। फर्रुखाबाद के अलावा शायद विश्व में अन्य कहीं भी नहीं बनाई जाती है। विश्वभर में प्रसिद्ध कपूरकंद को लोग फर्रुखाबाद आते है तो वह खाना व लेजाना नहीं भूलते है। इसकी मांग देश-विदेश तक है। इसलिए देश के विभिन्न शहरो में यहाँ से भेजा जाता है तथा देशभर में लगने वाले विभिन्न मेलों व महोत्सव में भी इसके स्टाल लगाये जाते है।
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मोहम्मद आकिब खांन (सोशल एक्टिविस्ट)
कुबेरपुर, कायमगंज, फर्रुखाबाद (उ०प्र०)

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फर्रुखाबाद : मेला रामनगरिया

मेला रामनगरिया
मेला रामनगरिया प्रवेश द्वार
फर्रुखाबाद में पांचाल घाट (घटियाघाट) पर हर वर्ष लगने वाला मेला रामनगरिया प्रदेश के प्रसिद्ध मेलों में से एक महत्त्वपूर्ण मेला माना जाता है। देश के विभिन्न शहरों से आये लोग यहाँ एक माह के प्रवास हेतु आते है व गंगा किनारे तम्बू लगा कल्पवास करते है। ऐसा माना जाता है कि कल्पवास करने से वस्तुतः साधक का कायाकल्प हो जाता है। मनसा, वाचा, कर्मणा व पवित्रता के बिना कल्पवास निश्फल हो जाता है। इसीलिए कल्पवास के लिए 21 कठोर नियम बताए गये है। जिनमें झूठ न बोलना, क्रोध न करना, दान करना, नशा न करना, सूर्योदय से पूर्व उठना, नित्य प्रात: संगम स्नान, एक समय भोजन व भूमि पर शयन मुख्य है। प्रत्येक वर्ष लगभग बीस हजार लोग कल्पवास के लिये यहाँ आते है। कम से कम पाँच लाख लोग विभिन्न गंगा स्नानों में डुबकी लगाने आते है। बच्चों के मनोरंजन के लिये सर्कस, नौटंकी, मौत का कुआँ आदि अनेकों खेल आकर्षण का केंद्र होते है। ग्रामीण बाजार लगाया जाता है जिसमें हर आवश्यक वस्तु मिलती है। रात में सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिये स्टेज बनाई जाती है जिसमें विभिन्न सरकारी व गैर सरकारी संस्थागत कार्यक्रम संचालित होते है। कवि सम्मेलन व मुशायरे का भी आयोजन होता है। कुम्भ की तरह यहाँ भी साधू संत अपने अखाड़ो के साथ आते है। पंडाल लगते है जिनमें धार्मिक प्रवचन सुन श्रोता भाव विभोर हो जाते है। सरकारी ईलाज की फ्री व्यवस्था के साथ सरकारी राशन की दूकानों पर अनाज आदि बाँटने की समुचित व्यवस्था होती है। सरकारी संरक्षण की स्थिति में मेला रामनगरिया फर्रुखाबाद की सांस्कृतिक धरोहर है।
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मोहम्मद आकिब खांन (सोशल एक्टिविस्ट)
कुबेरपुर, कायमगंज, फर्रुखाबाद (उ०प्र०)

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Tuesday, August 1, 2017

उत्तर प्रदेश के राजकीय प्रतीक

उत्तर प्रदेश के राजकीय प्रतीक

क्र० सं०
शीर्षक
हिंदी नाम
अंग्रेज़ी नाम
वैज्ञानिक नाम
1
पशु
बारहसिंघा
स्वैम्प डियर
रूसरवस डुवाओसेली
2
पक्षी
सारस
क्रेन
ग्रूस एंटीगोन
3
पुष्प
टेसू या ढाक
पलाश
ब्यूटिया मोनोस्पर्मा
4
मछली
मोय
चीतल
चिताला
5
पेड़
अशोक
अशोक
सराका असोका

पशु(बारहसिंघा):- 
Swamp Deer
इसके सींग बहुत बड़े तथा बहुशाखित होती है।
 जिनकी संख्या सामान्यतः 12 तक पहुँच जाती है इसलिए इसे बारहसिंघा कहा जाता है। दलदली जगहों में इनका प्राकृतवास होने के कारण इन्हें अंग्रेजी में “स्वैम्प डियर” कहा गया है। यह भारत वर्ष के मात्र तीन स्थानों उत्तर प्रदेश के तराई वन क्षेत्र, उत्तर पूर्व स्थित असम राज्य एवं मध्य प्रदेश के आरक्षित वन क्षेत्रों में पाया जाता है। मूलतः शाकाहारी प्रवृत्ति के इस जीव की ऊँचाई 130-135 सेमी., वजन लगभग 180 किग्रा. तथा सींगों की औसत लम्बाई 75 सेमी. होती है। इसका प्राकृतवास मुख्यतः दलदली व कीचड़ वाले ऊँची घास से आच्छादित क्षेत्र हैं। उत्तर प्रदेश में यह दुधवा राष्ट्रीय उद्यान, किशनपुर वन्य जीव विहार आदि में भी पाया जाता है। यह विश्व की संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में सम्मिलित है।

पक्षी (सारस):- 
Sarus Crane
सर अर्थात् सरोवर के पास इसका प्राकृतवास होने के कारण इसे सारस कहा जाता है। इसके नर और मादा एक साथ जोड़े में रहते हैं तथा लोकमान्यता में आदर्श दम्पत्ति के प्रतीक रूप में देखे जाते हैं।
 यह शुद्ध एवं स्वस्थ पारिस्थितिकीय तन्त्र वाले जलाशयों के पास ही मिलता है। यह लगभग 6 फीट ऊँचाई तथा 8 फीट तक पंखों के विस्तार के साथ कद में उड़ने वाले पक्षियों में सबसे ऊँचा पक्षी है। सारस उत्तरी एवं केन्द्रीय भारत, पाकिस्तान तथा नेपाल देश में पाए जाते है। इसके परों का रंग हल्का स्लेटी राख जैसा होता है तथा शिखर हल्के चिकने हरे पंखों से आच्छादित रहता है। ये कठोर परिस्थितियों, जैसे अत्यधिक ठंडक में भी सुगमता से जीवित रहते हैं। दलदली भूमि क्षेत्रों में ह्रास तथा प्राकृतवास संकुचित होने के कारण सारस संकटग्रस्त प्राणी हो गया है।

पुष्प (टेसू या ढाक):- 
Palash
श्रेष्ठ गुण वाली पत्तियाँ धारण करने के कारण इसे पलाश कहा गया है। इसकी पत्तियों में भोजन या प्रसाद लेना बहुत लाभदायक माना जाता है। इसके बीज पेट के कीड़े दूर करने की श्रेष्ठ औषधि हैं। यह वातरोग नाशक है। होली पर इसके फूल के रंग से होली खेली जाती है। आयुर्वेदिक क्षार प्राप्त करने के लिए यह सर्वश्रेष्ठ वृक्ष है। यह धीरे-धीरे बढ़ने वाला टेढ़ा-मेढ़ा मध्यम ऊँचाई का पर्णपाती वृक्ष है। सामान्यतः इसे टेसू, ढाक, पलाश एवं जंगल की आग के नाम से जाना जाता है। इसके तीन पर्णफलक होते हैं। इसके डेढ़ से दो इंच आकार के सुर्ख नारंगी लाल रंग के पुष्प फरवरी से मार्च के मध्य निकलते हैं। यह एक बहुपयोगी वृक्ष है। इसके पत्तों से दोने और पत्तल बनाये जाते हैं तथा यह चारा पत्ती, रेजिन, रंग, औषधि एवं चारकोल बनाने के काम भी आता है।

मछली (मोय):- 
Chitla
इस मछली की पीठ पर सुन्दर चित्ती पाए जाने के कारण इसको चीतल कहा गया है। चिताला संकटग्रस्त मत्स्य प्रजाति है जिसे साधारणतः फैदरबैक के नाम से जाना जाता है। विभिन्न प्रान्तों में इसे चीतल, मोय, पारी सीतुल वाला, काण्डल्ला आदि नामों से भी जाना जाता है। मीठे जल में मत्स्य पालन के लिए चीतल एक अच्छी एवं पौष्टिक प्रजाति की मछली है। यह भारत में गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, कोसी, गोमती, गेरुआ, सतलुज, केन, बेतवा एवं महानदी नदियों में पायी जाती है। इस प्रजाति का निवास बड़ी नदियों, झीलों, जलाशयों तथा रुके हुए पानी में है। शल्क छोटे होते हैं। इस प्रजाति मात्र में ही छोटी या वयस्क मछली के शरीर पर प्रायः सुनहरी या रूपहली लगभग 15 खड़ी धारियाँ होती है। इसकी अधिकतम लम्बाई 150 सेमी. एवं अधिकतम वजन 14 किग्रा. होता है। यह मछली द्विजननांगी होती है, जिसमें नर दो वर्षों के बाद तथा मादा 3 वर्षों के बाद परिपक्व होती है। यह प्रजाति संकटापन्न हो गयी है।


पेड़ (अशोक):- 
Ashok
लोकमान्यता में शोक नाशक होने के कारण इसे अशोक कहा गया है। इसकी छाल से अशोकारिष्ट दवा बनती है। पौराणिक पंचवटी का यह सदस्य वृक्ष है। यह आर्द्र क्षेत्र का वृक्ष है। हिन्दू नववर्ष के प्रथम दिन इसके फूल की कली वर्ष भर शोक रहित रहने के लिए खायी जाती है। औसत ऊँचाई के इस सदाबहार पवित्र वृक्ष का वर्णन हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। इसकी पत्तियाँ संयुक्त होती हैं तथा फूल और फल बड़े गुच्छों में फरवरी से अप्रैल के मध्य आते हैं। पौध रोपण हेतु इसकी नर्सरी पौध बीजों द्वारा उत्पादित की जाती है। सामान्यतः यह वृक्ष सघन छत्र होने के कारण उद्यानों, मार्गों के किनारे, आवास परिसरों व मंदिरों में लगाये जाते हैं।औषधीय गुणों के कारण यह आयुर्वेदिक औषधि बनाने में प्रयुक्त होता है। वर्तमान में यह प्रजाति संकटग्रस्त हो गयी है।

Wednesday, July 19, 2017

फर्रुखाबाद : भारतीय पुरातत्व विभाग में संरक्षित धरोहरें

भारतीय पुरातत्व विभाग में संरक्षित धरोहरें

क्र०सं०
धरोहर का नाम
स्थान
1
नवाब मोहम्मद खां बंगश का मकबरा
फर्रुखाबाद
2
ऑल सोल्स मेमोरियल चर्च
फतेहगढ़
3
ब्रिटिश इन्फैंट्री लाइन्स
फतेहगढ़
4
फतेहगढ़ किला
फतेहगढ़
5
क्वीन विक्टोरिया मेमोरियल
फतेहगढ़
6
सरजॉन थॉमस हैमिल्टन की समाधि
फतेहगढ़
7
नवाब रशीद खां का मकबरा
कायमगंज
8
ऐतिहासिक टीला (राजा द्रुपद का किला)
कम्पिल
9
ऐतिहासिक टीला (बहिर कोट)
संकिसा
10
कन्दायत ताल
संकिसा
11
बुद्धिष्ट विहार एवं टीला
पखना बिहार
12
ऐतिहासिक मस्जिद एवं सराय
खुदागंज
13
ऐतिहासिक पत्थर एवं पद्चिन्ह
खुदागंज
14
मिट्टी का किला (जॉर्ज गुर्थी की समाधि)
टटिया
15
ऐतिहासिक टीला
पिलखना